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The Great Thought: Rajasthani


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जिण जिव्हा माथे राजस्थानी, है बात उणरी और हर भाषा है महान पर, राजस्थानी सिरमौर सब सुणनी चाह्वे बारम्बार, आ इतरी सुहाणी है हर एक हिवड़ा रे नेड़ी, म्हारी राजस्थानी है

जंगल जलेबी का भी अलग शौक़ रखते, उसे तोड़ने के लिए हथियार भी अलग बनाते हैं। मिरिंडा, फेन्टा, कोका कोला हमें नहीं भाता, निबुं पानी जैसा मज़ा किसी ओर में नहीं आता।।

पुरे घर को सिर पे ले लेना, मस्ती करना और फिर डांट खा लेना। कुछ शैतानियां कर लेना, और अपनी शैतानी का इल्ज़ाम किसी ओर पर लगा देना।

पतंग उड़ा रे छोरा पतंग उड़ा छोरा मतना नज़र फिसला ,, पेज लड़ा री छोरी पेज लड़ा मर्दा आके तूना अकड़ दिखा !!

गर्मी अच्छी नहीं लगती है, गर्मीयों की छुट्टियां अच्छी लगती है। छुट्टि तो हर सप्ताह में आती हैं, गर्मीयों की छुट्टियां कुछ अलग ही लगती है।।

ना स्वर-शास्त्र री खामियां, ना व्याकरण री चूक अमृत सी मनभावन, आ बोली घणी अमूक सदाचार, सम्मान, अर प्रेम री निशाणी है हर एक हिवड़ा रे नेड़ी, म्हारी राजस्थानी है

हिवड़ो म्हारो तरस रह्यो सांवरा थारा दरसण ने भर गयो है हिवड़ो अब तो नैण आया है बरसण ने क्यूँ मन्ने तरसावे है अब तूँ और ना तड़पा, सुण हेलो सांवरा अब तूँ बेगो आ....

साल भर मिलतो कोनी, दिवाळी रे दिनां में इज् आवतो मैं भी लारे रेतो कोनी, घणो हारो मंगावतो फिर दांत पेट री देण नी करतो, मैं धाप धाप अर खावतो टाबरपणा में मन्ने म्हारे चिपड़ो घणो भावतो

दोस्तों की बनती टोली, फिर चुपके से निकल जाते , सिर पर नहीं रखते छाता, फिर तपता हमारा माथा। जेब में रखते प्याज के टुकड़े , क्ई लग न जाए लूं, लूं लगने में मां की थोड़ी मार खा लू।।

हृदय मेरा तरस रहा सांवरा तेरे दर्शन को भर गया है मन अब तो नैन आये हैं बरसन को क्यों मुझे तरसा रहे हो अब और ना तड़पाओ सुनो पुकार मेरी प्रभु भगवन जल्दी आओ....

दबे पांव , धीरे-धीरे सबसे चुपके चुपके घर से बाहर जाना, मां के उठने से पहले, बहुत सारे आम तोड़कर ले आना। मां को पता चलने पर, फिर डांट खा लेना, थोड़ी रोने की नौटंकी करना, फिर मुस्कुरा लेना।।

दोपहर में मां के सोने पर दोस्तों की टोली को बुला ले आना, मां के जगने से पहले आस-पड़ोस की शिकायतों का आ जाना। कुछ शैतानियां कर लेना, फिर गलती किसी ओर की बता देना।

बढ़ रह्यो हूँ बस थारी दीप्ति देख मैं है मन्ने भरोसो भगवन तूँ मिलेला जरूर..

जित्ती बोलां उत्तो ही, स्वाद बढ़तो जावे क्रोध री अग्नि में भी आ, शीतलता बरसावे अपार मिठास री एक अनमोल खाणी है हर एक हिवड़ा रे नेड़ी, म्हारी राजस्थानी है

प्रतीक्षा में आपकी कहीं देर न हो जाए मेरे चक्षु आपकी बाट में चिर निंद्रा न सो जाए अब ईश्वर मेरी न और नींद उड़ाओ सुनो पुकार मेरी प्रभु भगवन जल्दी आओ....


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